क्या आप भी इन संकीर्ण मानसिकताओं से घिरे हुए है

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मानसिकता में बदलावहम अक्सर जब सब्जी लेने मंडी जाते है तब सब्जी वाले से पैसे कम करने के लिए कहते है। ये जानते हुए भी की वो उस सब्जी के सही दाम ले रहा है हमें वो महंगी लगती है। शहरो में जगह और स्थान के हिसाब से वस्तुओ के पैसे लिए जाते है। जैसे की गली में मिलने वाली आइसक्रीम 10 रूपये की मिलती है वही आइसक्रीम हमें बड़े मॉल में 35 से 40 रुपये मिलती है। आमतौर पर माध्यम वर्ग के लोग वह जाकर ये सोचते भी है की हम गलत जगह आ गए है पर एक संकीर्ण सोच के चलते कुछ कह नहीं पाते है। मानसिकता में बदलाव को आज हम एक छोटे से किस्से से समझने की कोशिश करेंगे जो हमें अक्सर रोज देखने को मिल जाता है।

आजकल हम जब भी घर से बाहर निकलते है तो ये सोचते है की बाहर हमें जब लोग मिलेंगे तो वो क्या कहेंगे या फिर कोई लड़की मिल गयी तो अपनी तो पोपट हो जाएगी ना। इसलिए कुछ नया बनठन कर बाहर निकलते है। या फिर कॉलेज की क्लास में कैंटीन में हम सिर्फ दिखावे के लिए पैसे खर्च कर देते है ताकि लड़किया और लड़के हमारे बारे सोचे। क्या आप भी यही करते है। दुसरो के लिए खुद को सजाना तो एक पुतला भी करता है हम इंसान है हम क्यों दुसरो की सोच के अनुसार जिंदगी जिए। हमारी संकीर्ण मानसिकता में बदलाव लाना आज के ज़माने में तो बहुत जरुरी है। किसी ने सच ही कहा है।

दुनिया का सबसे अमीर आदमी है सब्जी बेचने वाला जो सब्जी के साथ धनिया बिलकुल फ्री देता है। नहीं तो बड़ी बड़ी दुकान वाले तो carry bag के भी पैसे पहले से जोड़ लेते है।

कल के अख़बार में कहानी के पृष्ठ को पढ़ते हुए मुझे ये छोटी सी कहानी मिली जो हमारे दैनिक जीवन पर फिट बैठती है। उम्मीद करता हूँ आपकी सोच में भी एक बदलाव आएगा।

मानसिकता में बदलाव को लाना है कितना जरुरी :

भैया दो सवारी का काट लो टीना ने कॉलेज के गेट पर उतारकर ऑटो वाले को 50 रु. का नोट देते हुए कहा। ऑटो वाले ने 30 रुपये वापस कर दिए।

अरे ये क्या ? आपको पता नहीं क्या हम स्टूडेंट है, हमें स्टूडेंट कंसेशन मिलता है, 4 रूपये और दो। टीना ने कहा।

मैडम, मैंने कम ही लिया है, नहीं तो यहाँ तक की एक सवारी का 15 रुपये होता है। ऑटो वाले ने कहा।

“आप लोग तो हमें ऐसे ही लुटते हो, में कुछ नहीं जानती, 4 रुपए और वापस करो” टीना ने कुछ तेज स्वर में कहा, तो आसपास खड़े लोग उसकी ओर देखने लगे।

मैडम डीजल का रेट इतना बढ़ गया है और फिर धंधा हो या ना हो, हमें शाम को ऑटो मालिक को किराया उतना ही देना पड़ता है, ऊपर से आप लोग….. हताशा और गुस्से से ऑटो वाले ने टीना के हाथ में 4 रुपये रख दिए और भुनभुनाते हुए आगे बढ़ गया।

जाने देती 4 रूपए की ही बात थी, गरीब ऑटो ड्राइवर है टीना की सहेली शालिनी ने कॉलेज में प्रवेश करते हुए कहा।

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अधिकारों का हनन क्या वाकई ?

कैसे जाने देती। बात 4 रुपये की नहीं है, सिद्धांतों की है और फिर जब तक हम अपने अधिकारों के प्रति जागरूक नहीं होंगे तब तक ये लोग हमें यू ही लुटते रहेंगे। और फिर ऑटो चलना उसका काम है उसको दया ही चाहिए तो ऑटो छोड़कर भीख मांग ले। तुम्हे ना अपनी मानसिकता में बदलाव लाने की जरुरत है। टीना ने छोटा सा लेक्चर शालिनी को दिया और कॉलेज में चली गई।

उस शाम को शहर के बड़े आइसक्रीम पार्लर में आइसक्रीम खाने के बाद वेटर ने 90 रु. का बिल टेबल पर रखा, तो टीना ने बड़ी अदा से 100 रु. का नोट देते हुए जब ‘कीप द चेंज’ कहा तो वेटर ने मुस्कुराते हुए अभिवादन में सर हिला दिया। टीना लेकिन मेनू के हिसाब से आइसक्रीम तो सिर्फ 70 रु. की थी। तूने कुछ कहा क्यों नहीं ? एक वेटर को टिप देने की क्या जरुरत थी। शालिनी ने पार्लर से बाहर आते हुए कहा।

अरे यार, में कुछ बोलती तो पार्लर मैनेजर और बाकी बैठे लोग हमारे बारे में क्या सोचते ? पर फिर 20 रु. की ही तो बात थी। पार्लर में वेटर को टिप ना देना ‘तहजीब’ के खिलाफ माना जाता है, तू भी न कुछ भी समझती नहीं। …

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क्या वाकई हम सही जा रहे है :

दोस्तों बड़े शहरो में आजकल यही देखने को मिलता है। एक गरीब ऑटो वाला, एक गरीब सब्जी बेचने वाले से जब हम कुछ लेते है तो उसके साथ ये जानते हुए भी ये वाजिब कह रहा है हम झगड़ा करके पैसे तुड़वाते है या फिर उन्हें निचा दिखाते है। लेकिन जब बात आती है बड़ी दुकानों की, पार्लर की, सिनेमा की जहा पर 10  रुपये वाला पॉपकॉर्न भी 50 रुपये लेकर बेचा जा रहा है हम कुछ नहीं कहते है। हमारी इस संकीर्ण मानसिकता में बदलाव लाना बेहद जरुरी है क्यों की हमें लगता है ऐसा करने से हम लोगो की नजरो में छोटे हो जायेंगे। क्या ये मानसिकता सही है। जगह देखकर तहजीब और व्यव्हार के मायने क्यों बदल जाते है।

दोस्तों कुछ लोग हमारे साथ इतने आदर से पेश आते है की हम उनके साथ पैसो को लेकर झगड़ने लगते है जबकि बड़े बड़े होटल में हमें देर से खाना सर्व किया जाता है वो भी बगैर किसी अपनेपन के तो भी हम उसके बिल को चुकाते है वो भी टिप और टैक्स के साथ। क्यों की ऐसा करके हमें लगता है की हम सही कर रहे है। हमें अधिकार और अपनेपन को पहचान कर व्यव्हार करने की मानसिकता में बदलाव लाना चाहिए जिससे की हम सही दिशा में चल सके।

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3 COMMENTS

  1. बहुत सही बात आपने कही है । हम जिस समाज मे रहते है उस समाज मे अधिकांश लोगो संकीर्ण मानसिकता के ही है । ऐसे लोगो को आपका यह लेख जरूर पढना चाहिए । धन्यवाद Kumar जी इस बेहतरीन लेख के लिए ।

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