कौवा बन कर नहीं आऊंगा श्राद्ध में जो खिलाना पिलाना है अभी खिला दे – आज के समाज की दुखद सच्चाई

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माता-पिता का बुढ़ापे में ख्याल रखना

माता-पिता का बुढ़ापे में ख्याल रखना ये एक ऐसी सोच है जो आज के युग में हर जवान बेटे को सिखाने की जरुरत है. बच्चो में संस्कार डालने की परम्परा कही बाहर से नहीं अपने घर से ही करनी पड़ती है. हर माँ-बाप यही सोचते है की उनका बेटा उनके बुढ़ापे में उनका ख्याल रखे लेकिन, क्या वो खुद इस बात का ख्याल / निर्वाह करते है ? ये तो वही बात हो गई की आप चाहते है की सब आपका सम्मान करे लेकिन इसकी शुरुआत आप खुद नहीं करोगे. इस श्राद्ध पक्ष में यानि पितृ-पक्ष में हर व्यक्ति जिस तरह से अपने माता-पिता की आत्मा की शांति के लिए प्रयास कर रहा है उनमे से आधा भी उसने उनके जिन्दा रहते हुए नहीं किया होगा.

माता-पिता का बुढ़ापे में ख्याल रखना

संयुक्त परिवार में रहते हुए हमें अपने माता-पिता का बुढ़ापे में ख्याल रखना चाहिए क्यों की उन्हें इस समय सबसे ज्यादा जरुरत अपनेपन की होती है. बुढ़ापा और बचपन एक जैसा होता है दोनों में ही अपनापन न मिले तो दुःख होता है. अगर आप भी चाहते है की आपका बुढ़ापा अच्छा गुजरे और आपकी संतान आपका सम्मान करे तो आज से ही अपने बुजुर्ग माता पिता का सम्मान और ख्याल करना शुरू कर दे, उन्हें वक़्त दे क्यों की अगर आप अपने बच्चो के सामने उनका सम्मान करते है तो वो भी ऐसा ही आने वाले समय में आपके साथ करेंगे. बच्चे बड़ो को देखकर ही सीखते है.

आखिर क्यों माता-पिता का बुढ़ापे में ख्याल रखना चाहिए ?

माता पिता के लिए अपनी संतान की ख़ुशी सबसे बढ़कर होती है. इसके लिए वो क्या कुछ नहीं करते और सहते है. वो ये सब कर के भी यही सोचते है की आज बच्चो का भविष्य का संवर जाए तो वो उनके बुढ़ापे में उनका अच्छा ख्याल रखेंगे. वो अपनी जवानी और ख्वाहिशे हमारे लिए त्याग देते है और जब हम अपने पैरो पर खड़े हो जाते है तब हम क्या करे है उनके साथ ? उनसे अलग रहने लगते है, old age house में भेज देते है या फिर उन्हें अपने ही घर में नौकरों की तरह रहने पर मजबूर कर देते है.

आज की कहानी समाज में एक सीख देने वाली कहानी है. हमें इससे काफी सिखने को मिलेगा अगर सीखना चाहे तो ! हम जो भी किसी को देते है वो एक न एक दिन वापस लौट कर हमारे पास ही आता है. अगर सम्मान देंगे तो सम्मान, दुःख देंगे तो दुःख. अब ये आप पर निर्भर करता है की आप क्या लेना पसंद करेंगे. इसलिए माता-पिता का बुढ़ापे में ख्याल रखना आज से ही शुरू कर दे क्यों की जो आप करेंगे वही आपके बच्चे आपके साथ करेंगे. इसे परम्परा और संस्कार कहते है जो एक बच्चा अपने घर से सीखता है.

कौवा बन कर नहीं आऊंगा श्राद्ध में जो खिलाना पिलाना है अभी खिला दे

शंकर के पिता की तबियत काफी दिनों से ख़राब चल रही थी. डॉक्टर ने सभी चेकअप कर लिए और शंकर की और पलटते हुए कहा

“अरे ! भाई बुढ़ापे का कोई इलाज नहीं होता है. वैसे भी अस्सी पार कर चुके है अब तो बस सेवा कीजिये.”

डॉक्टर साहब ! कोई तो तरीका होगा. विज्ञान ने बहुत तरक्की कर ली है आप कुछ तो कीजिये.

शंकर बाबु में सिर्फ अपनी और से अब दुआ ही कर सकता हूँ. आप बस अब इन्हें खुश रखे और वो खिलाए पिलाए जो इन्हें पसंद है. डॉक्टर मुस्कुराये और बाहर निकल गए.

शंकर पिता को लेकर बहुत चिंतित था. उसे लगता ही नहीं था की बिना पिता के कोई जीवन हो भी सकता है क्या ? माँ के जाने के बाद एकमात्र आशीर्वाद उनका ही बचा था. शंकर को आज अपने बचपन और जवानी के सारे दिन याद आ रहे थे. कैसे उसके पिता हर रोज कुछ न कुछ लेकर ही घर आते थे. वो इस युग में भी माता-पिता का बुढ़ापे में ख्याल रखना जैसे संस्कार रखने वालो में से एक था.

बाहर हल्की-हल्की बारिश हो रही थी. ऐसा लग रहा था जैसे आज तो आसमान भी रो रहा हो. शंकर ने किसी तरह खुद को संभाला और पत्नी से बोला

“रमा ! आज सबके लिए पकौड़े, चटनी बनाओ. में बाहर से जलेबी लेकर आता हूँ.”

पत्नी ने दाल पहले ही भिगो रखी थी सो जल्दी से वो काम में लग गई. कुछ ही देर में रसोई से खुशबु आने लगी और इतनी देर में शंकर भी बाजार से जलेबिया लेकर आ चूका था. जलेबी रसोई में छोड़ वो अपने पिता के पास बैठ गया.

उनका हाथ अपने हाथ में लिया और निहारते हुए कहाँ – “बाबा ! आज में आपकी मनपसंद जलेबी लेकर आया हूँ. थोड़ी जलेबी खा लो”

पिता ने हल्की सी पलके झपकाई और मुस्कुरा दिए. कमजोर आवाज में बोले “पकौड़े बन रहे है क्या ?”

“हाँ बाबा ! आज आपकी पसंद की हर चीज बन रही है. अरे सुषमा जरा पकौड़े और जलेबी लेकर आना” शंकर ने अपनी पत्नी को आवाज लगाईं.

“लीजिये बाबूजी एक और.”

“बस …. अब और नहीं. पेट भर गया है. जरा सी जलेबी दे दे.”

शंकर ने जलेबी का एक टुकड़ा हाथ में लेकर मुह में डाल दिया.

पिता प्यार से कई देर तक बेटे की ओर देखते रहे.

“शंकर बेटा सदा खुश रहो. मेरा दाना पानी पूरा हुआ, अब मुझे जाना होगा.” – पिता बोले

“बाबा अभी कैसे आप जाने की बात कर सकते है अभी तो आपकी और उम्र पड़ी है आपको और जीना है. अपने पोते के साथ खेलना भी तो है.”

आँखों में आंसू भर कर पिता बोले “मेरा जाना अब जरुरी है. जाऊंगा तभी तो पोते के रूप में वापस तेरे पास आऊंगा”

पिता एकटक बेटे को देखते रहे. शंकर ने प्लेट उठा कर एक तरफ रख दी मगर पिता अब भी उसे एकटक देख रहे थे. आँख भी नहीं झपक रही थी.

शंकर समझ गया की अब यात्रा पूर्ण हो गई है. तभी उसे अपने पिता की कही बाते याद आने लग गई. उसके पिता हमेशा उससे कहते थे.

“श्राद्ध खाने नहीं आऊंगा कौवा बन कर जो खिलाना है अभी खिला दे”

इसलिए हमें अपने माता-पिता का बुढ़ापे में ख्याल रखना चाहिए और उनकी इच्छा का सम्मान करना चाहिए.

उम्र के आखरी पड़ाव में हम उनके लिए क्या कर सकते है ?

काफी कुछ कर सकते है. हमारे बुजुर्ग माता-पिता कभी ये नहीं कहते की हमें पूरा दिन दो, हमारा ख्याल पूरा दिन रखो लेकिन,

  • जब भी उनसे मिले या उनके पास जाए उनके साथ सम्मान और आदर से बातचीत करे.
  • सुबह उठते ही घर के छोटे बच्चो को उनका आशीर्वाद लेने के संस्कार डाले. इससे न सिर्फ बच्चे सन्सक्री बनेगे बल्कि आपके माता पिता का पूरा दिन अच्छा हो जायेगा.
  • दिन में कुछ समय अपने बुजुर्ग माता-पिता के साथ गुजारे इससे उन्हें अच्छा लगेगा.
  • बुढ़ापे में खान-पान बदल जाता है. ऐसा भी खाने-पिने का मन करता है जो उनकी सेहत के लिए सही नहीं होता है लेकिन कभी कभार उन्हें वो देना चाहिये.
  • इस बात का हमेशा ख्याल रखे की उन्हें कभी अकेलापन महसूस न हो.

माता-पिता का बुढ़ापे में ख्याल रखना – अंतिम शब्द

दोस्तों अभी श्राद्ध पक्ष चल रहे है. बुजुर्गो और पूर्वजो की आत्मा की शांति के लिए हम आज इतने प्रयास / कोशिश या यू कहे दिखावा ( मेरी नजर में ये दिखावा ही है ) कर रहे है उसका अगर आधा भी उनके जीते जी कर लिया होता तो आज आपको इतना प्रयास करना भी न पड़ता. जिन्दा रहते हुए माता-पिता का बुढ़ापे में ख्याल रखना अपने आप में एक सच्ची सेवा है जिसके आगे श्राद्ध जैसी परम्परा कुछ नहीं. मै श्राद्ध पक्ष के खिलाफ नहीं हूँ ये हमारी सनातन परम्परा है लेकिन, जो लोग अपने माता पिता का उनके बुढ़ापे में सम्मान नहीं कर सकते, उनका ख्याल नहीं रख सकते उनके गुजरने के बाद उन्हें ऐसा क्यों लगता है की ऐसा करने से उनकी आत्मा को शांति मिलेगी ?

कुछ बातो का अहसास वक़्त गुजरने के बाद होता है. ऐसा आपके साथ न हो इसलिए आज से ही अपने बच्चो को संस्कार-वान बनाए. अगर आप अपने बच्चो के सामने माता पिता का सम्मान करोगे तो आपकी संतान आपके साथ बुढ़ापे में भी ऐसा ही बर्ताव करेगी. सनातन परम्परा का सम्मान और बुजुर्गो को महत्व देना आज से ही शुरू कर दे घर स्वर्ग बन जायेगा.

Credit : motivational internet stories 

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3 COMMENTS

  1. Dear sir,

    Ye aaj ki kdvi schai h. But Sir ek baat jrur bolunga main koi insaan ho ya koi chij jb tk hmare pass h uski importance ka nhi pta lgta h. Lekin jaise hi vo door ho gai to hmko apni sbhi gltiyo ka ehsaas ho jata h. Lekin tb tk bhut late ho chuke hote hain. Sant kabir ji ka ek Doha h ki ” अब पछताये कया होत जब चिडीया चुग गई खेत”

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