ब्रह्मराक्षस से जुड़ी ये कहानी और रहस्य जान कर आप यकीन नहीं कर पाओगे – किस्से पर आधारित

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ब्रह्मराक्षस की कहानी

ब्रहमराक्षस हिन्दू धर्म के अनुसार नर्क की आत्मा / राक्षस है.ये अतृप्त आत्माओ की श्रेणी में आते है। ब्रह्मराक्षस असल में ब्राह्मण की आत्मा होती है जो जन्म तो ब्राह्मण कुल में लेती है लेकिन बुरे / पतित कर्म करने लगती है तब लंबे जीवन के बाद उन्हें राक्षस योनि में भटकना पड़ता है। इसकी वजह उनका अपनी विद्या का गलत इस्तेमाल करना भी हो सकता है। ब्राह्मण वर्ण में कुछ उच्च ज्ञानी इंसान का जन्म इसलिए होता है ताकि वो दुसरो को अपने ज्ञान से प्रशिक्षित कर सके, जब वो ऐसा नहीं करते है तब वो मृत्यु के बाद ब्रह्मराक्षस बन जाते है। आइये जानते ब्रह्मराक्षस की कहानी की किस तरह उनका उद्भव होता है।

ब्रह्मराक्षस की कहानी
ब्रह्मराक्षस बनने के बाद उनमे ज्ञान का स्तर उतना ही रहता है लेकिन वो इंसानो को खाने लगते है। दूसरे शब्दो में उनमे ब्राह्मण और राक्षस दोनों के गुण होते है। हिन्दू धर्म के पुराणों में इसका विस्तृत वर्णन है जिसके अनुसार ऐसे ब्रह्मराक्षस में बहुत शक्तिया होती है और बहुत कम लोग ही इन पर काबू पा सकते है या फिर उन्हें इस योनि से मुक्ति दिला सकते है।

हिन्दू सभ्यता में ब्रह्मराक्षस का वर्णन :

7 वी सदी में एक संस्कृत कवि मयूरभट्ट ने एक कविता सूर्य सटक बनाई जिसमे एक ब्रह्मराक्षस ने सूर्य मंदिर जो की औरंगाबाद ( बिहार ) में पड़ता है उसमे खुद को सजा देने के लिए इस कविता का व्याख्यान किया था जो की खुद ब्रह्मराक्षस बना था इस तरह वो खुद के पाप का प्रायश्चित कर रहा था। ब्रह्मराक्षस और अन्य आत्माओ के पास बुरी प्रवर्ति होती है तो इनके प्रभाव से पेड़ सूख जाते थे और इन्हें उसे छोड़ना पड़ता था। मयूरभट्ट ने आत्माओ के प्रस्थान के बाद सफलतापूर्वक जैसे ही सूर्य उपासना का 100 वा अध्याय पूरा किया उसे मुक्ति मिल गई।

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ब्रह्मराक्षस की कहानी के अनुसार :

अलग अलग जगह अलग ब्रह्मराक्षस की कहानी प्रचलन में है। कई कहानियो जैसे की विक्रम बेताल, पंचतंत्र में ब्रह्मराक्षस का जिक्र किया गया है। इन कहानियो के अनुसार ब्रह्मराक्षस अगर किसी इंसान पर मेहरबान हो जाते थे तो उसे धन, सम्पदा, ऐश्वर्य से सम्पन बना देते थे। दूसरी कहानियो में इनका वर्णन एक राक्षस जिसके सर पर सिंग होते है के रूप में किया गया है। इनके अनुसार ये विशालकाय और मतलबी होते थे। इसके सर पर ब्रह्म की तरह ही चोटी होती थी जैसा की जिन्न का स्वरूप होता है। ये पेड़ो पर उलटे लटके रहते थे जैसा की विक्रम बैताल में वर्णित है।

ब्रह्मराक्षस और मंदिर :

दक्षिण भारत में प्रचलित ब्रह्मराक्षस की कहानी के अनुसार हिन्दू मंदिरो खासतौर से दक्षिण भारत के महाराष्ट्र के मंदिर इन ब्रह्मराक्षस का वर्णन करते हुए मिलते है। मंदिर की बाहरी दीवारों पर इनका चित्रण मिलता है जिनकी पूजा भी होती है। इन्हें सम्मान दिया जाता है और तेल का दिया भी जलाया जाता है। कई मंदिर जैसे की कोट्टायम ( केरल )के थिरुनककरा मंदिर में इन्हें भगवान के प्रतिक रूप में पूजा जाता है। इनकी मान्यता अनुसार ये निर्माण कार्य से पहले ब्रह्मराक्षस से अनुमति लेना जरुरी है। इसके अलावा यहाँ शिव मंदिर के साथ अलग से ब्रह्मराक्षस का मंदिर है। इस मंदिर के निर्माण की अपनी एक पौराणिक कहानी है।

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कहानी ब्रह्मराक्षस के मंदिर की :

कहानी के अनुसार पुराने समय में दो दोस्त थे एक राजा और एक मंदिर का पुजारी। मंदिर का पुजारी बहुत सुन्दर था और उनकी दोस्ती एक मिशाल थी राजा की पत्नी मूसा ( राजा का दोस्त ) से प्यार करने लगती है जब राजा को पता चला तो उसने मूसा मरवाने का हुक्म सुना दिया। राजा के गुलामो ने मूसा की हत्या की बजाय मंदिर के अन्य पुजारी की हत्या कर दी। इस घटना से पुजारी की पत्नी बेहद क्रोधित हो गई. एक ब्रह्मराक्षस के रूप में वह राज्य में उपद्रव मचाने लगी।

इसलिए राजा ने उसके लिए एक मंदिर निर्माण करवाया दिया और उसे वहां स्थापित होने की प्राथना की। इस शिव मंदिर में लंबे समय तक औरतो का प्रवेश वर्जित किया गया क्यों की अन्य मान्यता के अनुसार मदिकेरी शिव मंदिर का निर्माण नर्क राक्षस और ब्रह्मराक्षस से लड़ाई के दौरान किया गया था। अन्य एक मंदिर श्रृंगेरी मलयालम ब्रह्मा का मंदिर एक ब्रह्मराक्षस का ही मंदिर है। इस तरह के ज्यादातर उदाहरण दक्षिण भारत में मिलते है।

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ब्रह्मराक्षस और ब्रह्मा :

ये चूँकि ब्राह्मण कुल से बनते है इसलिए इनकी शक्तिया और उम्र अन्य बेताल से ज्यादा होती है। इनके पास अपने ब्राह्मण स्वरूप का ज्ञान और तप होता है इसलिए इन्हें पराजित और नियंत्रण करना बेहद मुश्किल होता है। इनकी मुक्ति स्वयं ब्रह्मा है क्यों की इनका उदभव ब्रह्मा से हुआ है।

ब्रह्मराक्षस की कहानी और पीपल :

माना जाता है की पीपल वृक्ष ब्रह्मराक्षस को आबादी से दूर रखने के लिए होता है अन्य मान्यता के अनुसार ब्रह्मराक्षस को पीपल वृक्ष पसंद होता है जिस पर वे वास करते है। अगर कोई इसे हटा दे तो ब्रह्मराक्षस क्रोधित हो जाते है। दोनों ही मान्यता में पीपल वृक्ष इन्हें आबादी वाले इलाके से दूर रखता है। ब्राह्मण कुल के कारण ब्रह्मराक्षस किसी अन्य वृक्ष पर वास नहीं कर सकते क्यों की ये निम्न श्रेणी के वृक्ष होते है। ब्रह्मराक्षस की कहानी के अनुसार और मान्यताओ के कारण ब्रह्मराक्षस बेताल श्रेणी के माने जाते है।

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ब्रह्मराक्षस की कहानी :

हमारे गांव मैं एक ब्राह्मण रहते है!जिनका नाम है! नत्थी लाल लोग उन्हें शर्मा जी शर्मा जी कहकर बुलाते हैं! उनके घर से कुछ दूर खेत था उस खेत पर एक बहुत बड़ा पीपल खड़ा था! वह पीपल बहुत पुराना था! कुछ समय बाद उन्होंने उस खेत पर घर बनवाने की सोची पहले वाला घर बहुत छोटा होने की वजह से उन्होंने खेत पर घर बनवाने की सोची उन्होंने उस पीपल को काट कर अपना घर बनवा लिया! कुछ दिन तो ठीक ठाक चला पर कुछ दिन बाद शर्मा जी बड़े पड़े परेशान रहने लगे

वह कभी वह पूजा करते थे कभी नहीं तो उनकी बीवी ने उनके बदले स्वभाव को देख उनसे पुछा की तुम पूजा भी नहीं करते आज कल बदले-बदले से रहते हो कभी बच्चो को डांटते रहते हो तुम्हे हुआ क्या है! पंडित जी के चेहरे पर पर मुस्कान आई और वह कहने लगे मेरे घर को तोड़ कर अपना घर तो बना लिया है! और इसे क्या पूजा करने की कह रही हो सब कुछ मैं ही हूँ मैं मैं ही भगवान् हूँ! इसे पूजा करने की कोई जरूरत नहीं हैं! वो कभी दांत मीसते कभी बड़े प्यार से बोलते कभी आंखें लाल तो कभी सही हो जाते थे!

पंडित जी में ब्रह्मराक्षस का वास

उनकी बीवी को शक हो गया की ज़रूर किसी भूत-प्रेत का साया है और वो बाते ऐसे करते हैं जैसे की वो दो लोग हों! तब पंडितानी ने उनको बिठा कर आसन लगा कर हनुमान चालीसा पढने लगी वो सोच रही थी अगर कोई भूत-प्रेत होगा तो भाग जायेगा पर पंडित जी पर उसका कोई असर नहीं पड़ा वह एक टक लगाये देखे जा रहे थे! उसने काफी मंत्र पढ़े गायत्री मंत्र ! तभी पंडित जी की आंखें लाल हुई और कहने लगे मैं किसी से नहीं डरने वाला और तू क्या समझ रही है मैं इसे ऐसे नहीं छोड़ने वाला

तब तक उसका छोटा बच्चा वहां आ गया मम्मी पंडित जी ने उसे ऐसे जोर से पकड़ के खींचा और ऐसा लग रहा था की उसके सिर को कच्चा ही चबा जाएगा पंडितानी ने कहा बच्चे को छोड़ दो इसने क्या तुम्हारा बिगाड़ा है उसे छोड़ दो पंडितानी ने विनती की बड़े नम्र भाव से कहा कि उसे छोड़ दो तो उसने उस बच्चे को छोड़ दिया और कहा कि मैंने तुम्हारे इस नम्र भाव कि बजह से इसे भी छोड़ रखा है नहीं तो मैं इसे कब का मार चुका होता उसने फिर पुछा तुम कौन हो और मेरे पति को तुमने क्योँ बस मैं कर रखा है!

ब्रह्मराक्षस की दया

आप हमसे क्या चाहते हो आप हो कौन तब उसने कहा अगर अपना भला चाहती हो तो पीपल के पेड़ लगाओ जितने भी हो सकें पेड़ लगाओ फिर मैं बताऊँगा कि मैं कौंन हूँ और फिर मैं चला जाऊँगा तब पंडित जी की बीवी ने एक सौ एक पेड़ पीपल के लगाये एक दिन उसकी पत्नी ने देखा की आज पंडित जी सुबह उठकर पूजा पाठ कर के आ चुके हैं! तब पंडितानी से पंडित जी बोले मैं तुम्हारे पति को आज छोड़ के जा रहा हूँ तुम सदा सुखी रहो तुम्हारे आचार-विचार बहुत अच्छे हैं!

मैं ब्रह्म राक्षस हूँ वैसे मैं किसी को नहीं छोड़ता और न ही किसी से डरता हूँ मैं ब्रह्म राक्षस हूँ-ब्रह्म राक्षस हा हा हा!तुम्हारे पति ने मेरे पीपल को काट दिया था जिस पर मैं हजारों सालों से रह रहा था! मुझे गुस्सा तो आया पर मैं तुम्हारी अच्छाई के कारण मैंने इन्हें छोड़ दिया जा रहा हूँ तुम्हारे पति को छोड़कर तब पंडितजी अचानक सही हो गए तब पंडित जी की बीवी की आँखों से आशु निकल पड़े! तो दोस्तों अगर बुरे के साथ अगर तुम अगर अच्छा करोगे हो तो एक दिन वह भी अच्छा हो जाता है! दोस्तों यह थी ब्रह्म राक्षस की कहानी….

अंतिम शब्द

दोस्तों ये थी छोटी सी जानकारी और ब्रह्मराक्षस की कहानी कुदरत के हर रहस्य के पीछे एक मतलब होता है। इसलिए हो सकता है की हर रहस्य को हम समझ नहीं पाए मगर गावो में आज भी मुख्य जगहों पर आपको पीपल के पेड़ मिल जायेंगे। ये सब हमारे बुजुर्गो की देंन है। इसलिए जरुरी नहीं हर जगह विज्ञान को लेकर हम वजह पूछे। कुछ बातो में विश्वास रखना ही समझदारी होती है।

आज की पोस्ट का मकसद किसी भी अंध-विश्वास को बढ़ावा देना नहीं है। ये सिर्फ आपके जानकारी के लिए है। आज की पोस्ट पर अपने विचार जरूर रखे। अगर ब्लॉग से जुडी कोई भी पोस्ट या जानकारी आपको पसन्द आती है तो ब्लॉग को शेयर करना ना भूले। आपका योगदान हमारे लिए महत्वपूर्ण है।

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2 COMMENTS

    • सॉरी sir अभी इस तरह की जानकारी मुझे नहीं है लेकिन अगर मिलेगी तो में जरुर शेयर करूँगा.

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